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जीवन जिने की कला - ओशो

जीवन जिने की कला - ओशो (150824)



ओशो उर्फ भगवान रजनीश हे अध्यात्म क्षेत्रातील क्रांतिकारक विचारवंत होते. मानवाच्या पंचेंद्रियांना सुखावणाऱ्या बाबींचा प्रत्येक धर्माने, धर्मगुरूने धिक्कार केला आहे.
ओशोची शिकवण या उलट आहे,समग्रतेने जगा, कोणत्याही बाबीचा धिक्कार, दमन न करता जगा. साक्षी भाव ठेवून जीवनरस पूर्ण शोषून घ्या.

साधक प्रश्न विचारतायेत आणि ओशो त्यावर बोलतात असं पुस्तकाचे स्वरूप आहे. सगळ्याच मुद्यांशी सहमत होता येत नसलं तरी नवा दृष्टिकोन मिळतो.

💡मृत्यूला टाळता आलं तर?

आपल्या देहात परमात्मा आहे, परमात्मा स्वरूप विश्वात तो एकरूप करण्याऐवजी देहात अडकवून का ठेवायचा? काय फरक पडतो तू 70 वर्षे जगला काय 700 वर्षे जगला काय किंवा 7000 वर्षे जगला काय? तू त्याच त्याच गोष्टींची पुनरावृत्ती करणार आहे.

मृत्यू ही संधी आहे परमात्म्यात विलीन होण्याची किंवा पुढील जन्मात शरीर रूपाने येऊन पुन्हा परमात्मा शोधण्याची.

मृत्यू हे रूपांतरण आहे, वरदान आहे पण त्यासाठी आधी जगलं पाहिजे. पूर्ण ताकद लावून जग, mindfullness, साक्षी भाव ठेवून जागृत राहून कर्म करणं हे खरं जगणं आहे. असा जगतो त्याच्यासाठी मृत्यू वरदान आहे.

( परमात्मा,पुनर्जन्म यावर विश्वास असो नसो, पण जागृत अवस्थेत दैनंदिन काम केल्यास तो अनुभव भिन्न असतो.mechanically व intentionally काम करणं यात फरक असतो. बरेचजण mechanically जगत राहतात त्यामुळे मृत्यूची भीती वाटते.
पण 
मृत्यू आणि टॅक्स कधीच चुकवता येत नाही.)

💡 संसार,जीवन निरर्थक आहे का?

दोष तुझ्या दृष्टीत आहे,धारणेत आहे, विचारात आहे. जबाबदारी टाळण्यासाठी आपण दोष दुसऱ्याला देतो. 

 मी म्हणतो सर्व काही अर्थपूर्ण, परिपूर्ण आहे. हे उधार उत्तर तु स्वीकारू नको. गौतम बुद्ध, महावीर वा इतर कोणी... कोणाचेही उत्तरं उधार घेऊन सत्य मानू नको, स्वतः शोध घे. तुझं उत्तरं तु शोध.

 💡स्त्री 

स्त्रियांना कंट्रोल मध्ये ठेवता यावं म्हणून त्यांना शिक्षणाचा हक्क नाकारला होता. आजही शिक्षण व्यवस्था, समाज पुरुषप्रधान आहे.यामुळे स्त्री व्यक्तिमत्वाचा विकास होतं नाही.त्यामुळे समाजही मागास विचारांचा राहत आहे.
ईर्षा हा स्त्रियांचा, अहंकार हा पुरुषांचा दुर्गुण आहे. 
शिक्षण व्यवस्थेत अमूलाग्र क्रांती घडवून स्त्री पुरुष समानता विचार रुजवला पाहिजे.

💡लहान मुलं 

आपली स्वप्न पूर्ण करण्याचं साधन समजून मुलांना वाढवलं जात. यात त्यांच्या व्यक्तिमत्वाचा लोप होतो. मुलांनी आज्ञाधारक व्हावं म्हणून प्रयत्न केले जातात पण यातून समाजाचा विचार करून जगायला प्राधान्य देणारा माणूस तयार होतो. नैसर्गिक प्रवृत्ती व सामाजिक मान्यता हा संघर्ष मानवी जीवन दुःखमय करतो. 

मुलांना खूप आदर, प्रेम द्या. त्यांच्या वर आपले विचार, स्वप्न न लादता स्वतंत्र्य व्यक्तिमत्व फुलवण्यासाठी सहाय्यक भूमिका पार पाडा. तुमची मुलं ही मालकीहक्क गाजवीण्यासाठी नसून परमात्म्याने काही काळासाठी दिलेली भेट आहे. तुम्हाला अनुरूप त्यांचं कंडिशनिंग करू नका.

💡प्रतिस्पर्धा 

स्पर्धे मुळे ईर्षा, असुया निर्माण झाली आहे. इतरांशी स्पर्धा केल्याने सहकार्य भावना लोप पावते. स्पर्धा ही स्वतःशीच असावी. 

आपण पदाला आदर देतो आणि कामाला दुय्यम लेखतो. या मानसिकतेमूळ प्रत्येकाला अधिकारी व्हायचं आहे इतरांना तो आपला प्रतिस्पर्धी मानतो आणि जीवन दुःखमय होतं.

बागकाम, चांभारंच काम यालाही शल्यविशारद इतकाच आदर द्यायला पाहिजे. पद, पैसा पाहून लोकं वागतात हे बदललं पाहिजे आणि याची सुरुवात शिक्षण व्यवस्थेपासूनच होईल.

💡समर्पण 

स्वामी रामतीर्थ यांना एक गणित 5-6 तास प्रयत्न करून ही सुटत नव्हतं. त्यांनी टेबलवर एक सुरा ठेवला आणि 15 मिनिटात गणित न सुटल्यास सुरा स्वतःच्या छातीत घुसवण्याची प्रतिज्ञा केली. आणि गणित सुटलं. हे आहे समर्पण 

आपण प्रत्येक क्रिया अशी केली पाहिजे की ही अखेरची वेळ आहे. पुन्हा कधीही संधी मिळणार नाही, पूर्ण अवधान (mindfullnes ), मग जीवनात क्रांती घडेल.


_सिद्धेश्वर 

पुस्तकातील उतारे 

👉🏻मौत दुश्मन नहीं है कि उस पर विजय पाओ : मौत तो महामित्र है। मौत तो तुम्हारे सारे जीवन के उपद्रव, सारे जीवन की आपाधापी के बाद विश्राम का क्षण है। मौत तो तुम्हें नयी देह देगी, नया जीवन देगी। अगर कुछ पाठ लिए हों, पुराने जीवन से तो नये जीवन में उनका उपयोग कर लेना। मौत तुम्हें एक अवसर देगी पुरानी आदतें छोड़ने, पुरानी देह के छोड़ने का। मौत तो एक महा अवसर है।

👉🏻मौत पर विजय पाकर क्या करोगे? क्या हाथ लगेगा? सत्तर साल की जिंदगी हो कि सात सौ साल की सात सौ साल हो कि सात हजार साल की-क्या होगा? तुम वही दोहराए जाओगे ना। इतना दोहराने से भी तुम्हें समझ नहीं आती। इन्हीं-इन्हीं गड्ढों में फिर-फिर गिरोगे। यही-यही भूलें फिर-फिर करोगे।

👉🏻तुम्हें अपना उत्तर खोजना होगा। अपना सत्य ही मुक्त करता है, दूसरों के सत्य सिद्धांत बन जाते हैं संप्रदाय बन जाते हैं। दूसरों के सत्य तो बंधन बन जाते हैं।

👉🏻तो कल पर न टालना। अगर कोई बात ठीक प्रतीत हुई, तो उसे आज से शुरू कर देना जरूरी है।

👉🏻वह तुम्हारा भागना ही बता देता है कि तुम अपने भी मालिक नहीं दूसरे के मालिक होने का हक कहां से पाओगे! इंद्रियों के पीछे भागता हुआ आदमी इंद्रियां भी समझ जाती हैं कि कैसे बेकार हो तुम। कुछ भी तुम्हारे पास नहीं। तुम क्षुद्र के लिए भाग रहे हो।

👉🏻सचेत होओ। ध्यान तुम्हें सचेत करेगा। ध्यान तुम्हारी यात्रा का आयाम बदलेगा। और एक बार तुम्हें भीतर का स्वर सुनाई पड़ने लगे, क्रांति घटित हो गई। इंद्रियां अपनी जगह होंगी और स्वस्थ होंगी। उनका नाच भी चलता रहेगा; क्योंकि उनके नाच से कुछ बाधा नहीं है। लेकिन वे परिधि पर होंगी अपने स्थान पर होंगी। तुम्हारे साथ चलेंगी तुम्हारी छाया होंगी। और जिसने भीतर के इस राम को पा लिया इस भीतर के केन्द्र को पा लिया उसे पाने को फिर कुछ शेष नहीं रह जाता। तभी संतोष फलित होता है उसके पहले संतोष नहीं होगा।

👉🏻आदमी की पुरानी कमजोरी है और वह यह कि दोष कभी भी अपने ऊपर नहीं लेना चाहता है दोष सदा किसी और पर डाल देना चाहता है। संसार असार है यह कहना सुविधापूर्ण मालूम होता है, बजाय इसके कि मेरी दृष्टि अंधी है, मेरी दृष्टि गलत है। संसार को असार कहने से मुझे स्वयं को नहीं बदलना पड़ता लेकिन मेरे देखने का ढंग गलत है तो मुझे स्वयं को बदलने की जरूरत आ जाती है।

👉🏻हर गांव के लोग वैसे ही होते हैं जैसे आप होते हैं। गांव के लोग आपके ऊपर निर्भर करते हैं कि आप कैसे हैं। गांव स्वर्ग हो जाता है, अगर आपके भीतर प्रेम है, गांव नरक हो जाता है अगर आपके भीतर घृणा है।

👉🏻संसार तो बड़ा गांव है। थोड़ी देर के लिए हम उसमें मेहमान होते हैं और उन लोगों को मैं अधार्मिक कहता हूं जो संसार को असार कहते हैं। धार्मिक आदमी मैं उसको कहता हूं जो असार को खोजता हो तो अपनी दृष्टि में अपने मन में।

👉🏻हम दूसरे में उसी को खोज लेते हैं, जो हम हैं।

👉🏻अकेले में तो हर आदमी महात्मा हो जाता है, सवाल तो भीड़ के बीच में होने का है। अकेले में महात्मा होने में कौन सी कठिनाई है। अकेले में महात्मा होने के सिवाय कोई विकल्प नहीं है कोई उपाय नहीं है कोई अल्टरनेटिव नहीं है महात्मा होना ही पड़ता है। दूसरे की मौजूदगी वह जो कि अंदर है, वह जो दूसरा है वही मुझे कसौटी पर कसता है कि मैं कहां हूं। उसकी मौजूदगी मुझे खोलती है और प्रकट करती है।

👉🏻जीवन की बड़ी से बड़ी शांति की उपलब्धि अपने व्यक्तित्व को पाने से शुरू होगी। और जिस दिन जो हम बनने की पैदा हुए हैं वही बन जाते हैं उसी दिन मन प्रफुल्लता से भर जाता है।

👉🏻पुरुष के समान खड़े होने का यह मतलब नहीं है कि स्त्रियां पुरुषों जैसी हो जायें। पुरुषों के समान होने का अर्थ है कि पुरुषों ने पुरुष होने में जितना विकास किया है स्त्रियां, स्त्रियां होने में उतना विकास करें।

👉🏻अतीत के बारे में चिन्ता क्यों करते हो? उसको भूल जाओ। अब तुम इस तरह से जीना शुरू करो जैसे तुम्हें जीना आता ही न हो। तुम्हें सिखाने वाला कोई नहीं है और न ही कोई मार्गदर्शन ही तुम्हारे पास है। कोई ऐसी पुस्तक नहीं है जिसमें लिखा हो ऐसा-कैसे किया जाए, वैसा किस तरह करें। तुम जैसे एक द्वीप में अकेले हो। वहां सब कुछ उपलब्ध है। तुम्हारे अंदर बुद्धि है, समझ है, तुम्हारे अंदर सोचने-समझने की शक्ति है। अब तुम अपना जीवन शुरू करो। 

👉🏻ईर्ष्या जहां है, वहां प्रेम संभव नहीं है। ईर्ष्या और प्रेम का संबंध ही नहीं है। लेकिन जैसा मैंने कहा कि स्त्री और पुरुष के मनस में क्या फर्क है- पुरुषों का मन एक्टिव है, सक्रिय है, इसलिए पुरुषों का मूल दुर्गुण अहंकार है। और स्त्रियों का मन पैसिव है, निष्क्रिय है, इसलिए स्त्रियों का मूल दुर्गुण ईर्ष्या है। ईर्ष्या निष्क्रिय हुआ अहंकार है और अहंकार सक्रिय हो गयी ईर्ष्या है।

👉🏻ईर्ष्या के रहते स्त्री का व्यक्तित्व कभी प्रेमपूर्ण नहीं हो सकता। और प्रेम ही स्त्री का प्राण है, उसकी आत्मा है।

👉🏻जिस क्षण तुम किसी का उपयोग करना चाहते हो तुम निर्दयी हो जाते हो। किसी का साधन की भांति उपयोग करने पर विचार में निर्दयता आ गई हिंसा आ गई।

👉🏻तुम बच्चे को बस आनंद के लिए प्रेम करो, तुम बच्चे को प्रभु का उपहार जानकर प्रेम करो, तुम बच्चे को प्रेम करो क्योंकि परमात्मा ऐसा ही है...

👉🏻यदि तुम वास्तव में ही बच्चे को प्रेम करते हो, तुम उस पर अपने विचार आरोपित नहीं करोगे... तुम बाधा नहीं डालोगे यदि तुम प्रेम करते हो? तुम कहते हो ठीक है। मेरा आशीष तुम्हारे साथ है। जाओ। अपना सत्य स्वयं खोजो। बच्चे तुमसे आते हैं लेकिन उनका संबंध परमात्मा से है। वे समग्र अस्तित्व के हैं। उन पर एकाधिकार मत करो। मत सोचो कि वे तुम्हारे हैं।

👉🏻आज्ञाकारिता बुद्धिमत्ता की हत्या है अभिभावक आज्ञाकारी बच्चे को पसंद करते हैं और याद रहे - आज्ञाकारी बच्चा लगभग सदैव ही सर्वाधिक मूर्ख बच्चा होता है। एक विद्रोही बच्चा बुद्धिमान होता है लेकिन उसका कोई आदर नहीं है प्रेम नहीं है।

👉🏻और प्रत्येक बच्चा अनंत संभावनाओं के साथ पैदा होता है और यदि उसके मूल व्यक्तित्व को विकसित होने में सहयोग दिया जाए-बिना किसी बाधा के-तब यह दुनिया सुन्दर होगी।

👉🏻बुद्धिमान लोग बहुत कम मिलते हैं इसलिए नहीं कि वे पैदा नहीं होते। वे बहुत कम मिलते हैं क्योंकि समाज की कंडिशनिंग से बचना बहुत कठिन है। 

👉🏻बच्चों को जितना हो सके समादर दो क्योंकि वे अभी नए हैं, मासूम हैं और ईश्वर के निकट हैं। उनका आदर करो। उन्हें हर तरह के कपटी, चालाक, धूर्त और बेहूदे लोगों का आदर करने को बाध्य मत करो-वह भी सिर्फ इसलिए क्योंकि वे आयु में बड़े हैं।

👉🏻क्या तुम जानते हो कि बच्चों का आदर करने से क्या संभव हो सकता है? तब प्रेम और आदर के द्वारा तुम उन्हें गलत दिशा में जाने से रोक सकते हो। किसी भय के कारण नहीं बल्कि अपने प्रेम और आदर के कारण।

👉🏻जिंदगी चारों तरफ बहुत बड़ी शिक्षा है। जिंदगी चारों तरफ बहुत बड़ा सत्य है। जिंदगी चारों तरफ रोज-रोज खड़ी है, द्वार पर। हमारी आंखें बंद हैं और हम पूछते हैं; सत्संग करने कहां जाएं? और हम पूछते हैं; किसके चरण पकड़े किसको गुरु बनायें? 

👉🏻तो मैं नहीं कहता कि गुरु जरूरी है ज्ञान के लिए। मैं कहता हूं, सीखने की क्षमता जरूरी है। आध्यात्मिक जीवन में गुरु नहीं होते, केवल शिष्य होते हैं। गुरु नहीं होते, टीचर्स नहीं होते केवल डिसाइपल्स होते हैं।और जहां गुरु भी होते हों, समझना कि वहां धंधा होता होगा धर्म के नाम पर।

👉🏻न कोई निकृष्ट है, न कोई श्रेष्ठ है। व्यक्ति सिर्फ स्वयं है, अतुलनीय।

👉🏻प्रत्येक बच्चे को सिखाया जाए कि उसके क्रोध, घृणा, ईर्ष्या को प्रेम में कैसे रूपांतरित किया जाए।

👉🏻इन वृक्षों, फूलों और सितारों का तुम्हारे हृदय के साथ कोई नाता जुड़ना चाहिए। ये सूर्योदय और सूर्यास्त महज बाह्य घटनाएं नहीं होनी चाहिए वे कुछ आंतरिक भी हों।

👉🏻अगर अच्छी शिक्षा हो तो बच्चों को यह समझाया जाना चाहिए कि कोई काम छोटा और बड़ा नहीं है।

👉🏻जब तक दुनिया में पदों के साथ इज्जत होगी तब तक अच्छी दुनिया पैदा नहीं हो सकती और ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा काम के कारण नहीं है प्रतिस्पर्धा है पदों के साथ जुड़े हुए आदर के कारण। कोई आदमी बागवान नहीं होना चाहता बागवान होने में कौन सी इज्जत मिलेगी? राष्ट्रपति होना चाहता है। यह तब तक चलेगा जब तक हम गरीब बागवान को भी इज्जत देना शुरू नहीं करेंगे।

👉🏻जहां हम काम को आदर देंगे, पदों को नहीं, जहां हम श्रम को आदर देंगे, धन को नहीं। अभी तो धन की प्रतिष्ठा है, श्रम की कोई प्रतिष्ठा नहीं।

👉🏻मुझे स्वयं को विकसित करना है, मुझे आज जहां मैं हूं वहां से कल मुझे आगे होना है। दूसरे के आगे नहीं मुझे स्वयं से प्रतिदिन आगे होते जाना है।

👉🏻दूसरे के साथ किसी भी तरह की स्पर्धा शुभ नहीं है।

👉🏻पूरे प्राणों से जो जीता है, वह निरंतर स्वतंत्रता में जीता है, वह हमेशा फ्रीडम में जीता है। उसके लिए कोई मोक्ष कहीं नहीं। प्रति पल वह मोक्ष में जीता है, इसलिए कोई मोक्ष स्वर्ग में नहीं है, कोई मोक्ष आकाश में नहीं है। वह है जीवन की परिपूर्णता से जीने की कला में।

👉🏻हारा हुआ आदमी हमेशा इसी कोशिश में होता है कि कोई बहाना मिल जाए खुद को दोष न देना पड़े। हारे हुए लोग - स्मरण रखिए हारे हुए लोग अब तक धर्म में उत्सुक होते रहे हैं। हारे हुए लोगों की जमात धर्म के आस-पास एकत्र हो गई है।

👉🏻इंद्रियों की शिक्षा है साधना। इंद्रियों का विरोध नहीं, दमन नहीं, सप्रेशन नहीं। एक-एक इंद्री ऐसी साधी जा सकती है कि उसके द्वार से प्रभु तक पहुंचने का मार्ग बन जाए।

👉🏻तो मैं आपसे कहूंगा स्वाद है तो पूर्ण स्वाद लीजिए अस्वाद नहीं। भोजन कर रहे हो तो ऐसा करिए कि भोजन करना ही एकमात्र कृत्य रह जाए। सारा प्राण, सारी देह, सारी शक्ति, समग्र चेतना भोजन करे। जरा-सा स्वाद छूट न जाए। स्वाद में इतनी लीनता, इतनी तल्लीनता, इतना आत्मभाव। फिर आपको पता चलेगा कि अन्न ब्रह्म हो जाता है। फिर आपको पता चलेगा कि स्वाद भी उसकी खबर है और तब भोजन करके अगर आपका हृदय धन्यवाद से भर जाए परमात्मा के लिए, तो आश्चर्य नहीं। 

👉🏻स्मरण रहे कि वर्तमान के क्षण के अतिरिक्त किसी चीज का कोई अस्तित्व नहीं है।

👉🏻किसी भी चीज पर ध्यान देना उस चीज के लिए एक तरह का भोजन है। और जब तुम पीड़ा या दुःख पर बहुत ज्यादा ध्यान देते हो तो तुम्हारी पूरी दृष्टि उलट जाती है। तुम्हें लगता है कि जीवन तो जीने योग्य ही नहीं है... 

👉🏻बहुत ज्यादा ध्यान देने से पीड़ा बड़ी हो जाती है, कई गुणा हो जाती है। वह इतनी बड़ी हो जाती है, जितनी वह है नहीं।

👉🏻वह व्यक्ति जीवित कैसे कहा जा सकता है जिसे अपने भीतर जो जीवन की धारा बह रही है उसमें जिसकी कोई प्रतिष्ठा न हो? वह व्यक्ति जीवित कैसे हो सकता है जिसे उस तत्व का पता न हो जिसकी कोई मृत्यु नहीं होती है?

👉🏻संसार को छोड़कर भाग जाने वाले लोग आईने को तोड़ने वाले लोग हैं। अगर संसार दुःखद मालूम पड़ता है तो स्मरण रखना कि संसार एक दर्पण से ज्यादा नहीं। अगर दुःख हमारे जीवन की व्यवस्था है तो संसार में दुःख दिखाई पड़ेगा।

👉🏻मेरे जीवन भर का अनुभव यह है कि खतरे में ही मनुष्य जागता है। खतरा नहीं होता तो कोई आदमी जागता नहीं। तो मैं खतरे पैदा करूंगा ताकि तू जाग सके।’

👉🏻स्मरण रखें जितने ज्यादा विचार होंगे, जागरूकता उतनी ही कम होगी। जितनी जागरूकता ज्यादा होगी उतने विचार कम होंगे। विचार और जागरूकता थॉट्स और अवेयरनेस विरोधी बातें हैं, ये दोनों एक साथ नहीं होती हैं।

👉🏻सच्चाई तो यह है कि मौत चौबीस घंटे हमारे पीछे तलवार लेकर पड़ी हुई है।

👉🏻परमात्मा कहां नहीं है? परमात्मा सब जगह है। सब झाड़ियों में वही है। तुम्हें दिखाई पड़े, न दिखाई पड़े - यह और बात है, यह तुम्हारी आंख की बात है। मैंने तो उसे हर झाड़ी में देखा है। मैंने तो तुम में भी उसे देखा है। मैं तुम में उसे देख रहा हूं। मैं झाड़ी-झाड़ी में उसे देख रहा हूं। हर फूल में उसकी लपट है। जीवन उसकी लपट है और कैसी ठंडी लपट है - आग है और जलाती नहीं। आग है और जिलाती है, जलना तो दूर। यह सारी पृथ्वी, यह सारा जीवन पवित्र है, तीर्थ है। न जाओ काबा, न जाओ काशी, न जाओ कैलाश। तुम जहां हो वहीं इस परमात्मा की उपस्थिति का अनुभव करो। वही काबा है, वही काशी है, वही कैलाश। जहां भी कोई व्यक्ति शांत, मौन, आनंदमग्न हो उत्सव में लीन हो जाता है - वहीं तीर्थ निर्मित हो जाते हैं। – ओशो

👉🏻संन्यासी को सृजनात्मक होना चाहिए। जो भी करो उसे इतने प्रेम से करो, इतने आह्लाद से करो कि जैसे सारा जीवन उसी कृत्य को करने के लिए बना हो। जैसे कल होगा ही नहीं और आज जो कर रहे हो उसमें अपने को पूरा उड़ेल देना है।

👉🏻सृजनात्मकता का अर्थ इतना नहीं है कि कविता करो। जो भी करो वह तुम्हारा ध्यान हो, मौज हो, मस्ती हो। फर्श साफ करो तो ऐसे जैसे परमात्मा के लिए किया जा रहा है।

👉🏻जब भी हमारे जीवन में कहीं से भी सुख की कोई किरण उतरती है, तो वे ही क्षण होते हैं जब हम खाली बिना काम के समुद्र के तट पर या किसी पर्वत की ओट में या आकाश में तारों के नीचे या सुबह उगते सूरज के साथ आकाश में उड़ते हुए पक्षियों के पीछे या खिले हुए फूलों के पास कभी जब हम बिना काम बिल्कुल बेकाम बिल्कुल व्यर्थ बाजार में जिसकी कोई कीमत न होगी - ऐसे किसी क्षण में होते हैं, तभी हमारे जीवन में सुख की थोड़ी-सी ध्वनि उतरती है। लेकिन यह आकस्मिक, एक्सिडेंटल होती है। ध्यान व्यवस्थित रूप से इस किरण की खोज है।

👉🏻प्रेम के अज्ञात हाथों से की गई सेवा से बड़ी न तो कोई साधना है और न ही कोई प्रार्थना ही।

👉🏻जीवन में सब कुछ क्षणभंगुर है। जो अभी हाथ में है क्षणभर बाद हाथ के बाहर हो जाएगा। जो श्वास अभी भीतर है, क्षणभर बाद बाहर होगी। ऐसा प्रवाह है जीवन। इसमें जिसने भी रुकने की कोशिश की वही गृहस्थ है। और जिसने जीवन के प्रवाह में बहने का सामर्थ्य साध लिया, जो प्रवाह के साथ बहने लगा - सरलता से, सहजता से, असुरक्षा से, अनजान में, अज्ञात में - वही संन्यासी है।

1)जीवन एक प्रवाह है। 

2)जीवन जो भी दे उसके साथ पूर्ण संतुष्टि और पूर्ण अनुग्रह।

3)जीवन में सुरक्षा का मोह न रखना।जितना जीवंत व्यक्तित्व होगा, उतना असुरक्षित होगा; और जितना मरा हुआ व्यक्तित्व होगा उतना सुरक्षित होगा।जो असुरक्षित होने को तैयार हो गया निराधार होने को, उसे परमात्मा का आधार उपलब्ध हो जाता है।

👉🏻संन्यास का अर्थ ही यही है कि मैं निर्णय लेता हूं कि अब से मेरे जीवन का केंद्र ध्यान होगा। अन्य कोई अर्थ ही नहीं है संन्यास का। जीवन का केंद्र धन नहीं होगा, यश नहीं होगा, संसार नहीं होगा। निश्चित ही संन्यास ध्यान के लिए और ध्यान संन्यास के लिए गति देता है। ये संयुक्त घटनाएं हैं और मनुष्य के मन का नियम है कि निर्णय लेते ही मन बदलना शुरू हो जाता है।

👉🏻संन्यासी यानी असुरकक्षा 

👉🏻जीवन के पास हम कौन-सा दृष्टिकोण लेकर जाते हैं, उससे जीवन का उत्तर बदल जाता है। अगर हम उदास और निराश दृष्टिकोण लेकर गए तो जीवन भी कहता है नहीं-नहीं। और अगर हम प्रफुल्लता से, अहोभाव से, कृतज्ञता से, ग्रेटीट्यूड से, आशा से प्रेम और प्रार्थना से भरा हुआ दृष्टिकोण लेकर गए तो जीवन कहता है हां! तो जीवन की बांहें हमारे चारों तरफ फैल जाती हैं और अपने आलिंगन में ले लेती हैं और जब हम गलत कोण से जीवन के पास पहुंचते हैं, तो द्वार बंद हो जाते हैं।

👉🏻शांत होकर बैठ जाओ। जोर से श्वास को बाहर फेंको-उच्छवास। भीतर मत लो श्वास को क्योंकि जैसे ही तुम भीतर गहरी श्वास को लोगे भीतर जाती श्वास काम-ऊर्जा को नीचे की तरफ धकेलती है। जब तुम्हें काम-वासना पकड़े तब एक्सहेल करो, बाहर फेंको श्वास को। नाभि के भीतर खींचो पेट को, भीतर लो और श्वास को बाहर फेंको जितनी फेंक सको। धीरे- धीरे अभ्यास होने पर तुम संपूर्ण रूप से श्वास को बाहर फेंकने में सफल हो जाओगे।

👉🏻सम्यक् दृष्टि। जो है, वही देखना। जैसा है, वैसा ही देखना। अन्यथा न करना। कोई धारणा बीच में न लानी।

👉🏻जिद्दी को संकल्पवान, कहते हैं। जिद तो अहंकार है। संकल्प में कोई अहंकार नहीं होता। हठ और संकल्प में यही फर्क है। हठ में असली मुद्दा अहंकार का है।

👉🏻सम्यक वाणी। जो है वही कहना। वैसा ही कहना अन्यथा नहीं। बदलकर नहीं ऊपर कुछ भीतर कुछ ऐसा नहीं। क्योंकि अगर तुम सत्य की खोज में चले जाते हो तो पहली शर्त पूरी करनी पड़ेगी कि तुम सच्चे हो जाओ।

👉🏻तुम अपने जीवन में थोड़ा देखना तुम कुछ हो भीतर बाहर कुछ बताए चले जाते हो। धीरे- धीरे यह बाहर की परत इतनी मजबूत हो जाती है कि तुम भूल ही जाते हो कि तुम भीतर क्या हो। सम्यक वाणी का अर्थ होता है, धीरे- धीरे सभी अर्थों में दृष्टि में संकल्प में, वाणी में हृदय की अंतर्तम अवस्था को झलकने देना।

👉🏻सम्यक कर्मांत। वही करना जो वस्तुतः तुम्हारा हृदय करने को कहता है।

👉🏻अगर तुम्हारी आजीविका सम्यक हो, तो तुम्हारे जीवन में शांति होगी। अगर तुम्हारी आजीविका सम्यक हो तो सत्य और तुम्हारे बीच अनेक बाधाएं कम हो जाएंगी।

👉🏻सम्यक व्यायाम। अति न करना। बुद्ध कहते हैं - ‘कुछ लोग हैं आलसी और कुछ लोग हैं अति कर्मठ। दोनों ही नुकसान में पड़ जाते हैं।

👉🏻अब न गहरी नींद में तुम सो सकोगे गीत गाकर मैं जगाने आ रहा हूं। अतल अस्ताचल तुम्हें जाने न दूंगा। अरुण उदयाचल सजाने आ रहा हूं। – ओशो

👉🏻चेतना की चार अवस्थाएं : जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय

👉🏻तुरीय। तुरीय का अर्थ होता है - चौथी। उसे विशेषण नहीं दिया; क्योंकि वह तीनों के पार है। हां, तुरीय अवस्था में श्वास ठहर जाती है इसलिए जैसे-जैसे तुम ध्यान में गहरे उतरोगे तुम चकित होओगे, कभी-कभी ऐसे क्षण आएंगे ध्यान में जब तुम्हें लगेगा जैसे श्वास बंद हो गई। घबराना मत उससे तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी क्योंकि शरीर की श्वास तो बंद हो जाती है - वह बंद ही तब होती है जब तुम्हारे भीतर और एक सूक्ष्म श्वास का अवतरण हो जाता है और भी एक सूक्ष्म जीवन धारा तुममें बहने लगती है, परमात्मा तुममें प्रवेश करने लगता है, तभी यह श्वास बंद होती है, नहीं तो यह श्वास चलती ही रहेगी।

👉🏻श्वास जब ध्यान में बंद होती है तो इसका अर्थ ही इतना है कि अब इस छोटे उपाय की जरूरत नहीं रही जीवन को। जीवन महाजीवन से जुड़ गया है। अमृत से जुड़ गया है। परमात्मा से संयुक्त हो गया है।

👉🏻रोना बच्चे के श्वास लेने का पहला प्रयोग है। रोकर वह यह घोषणा कर रहा है कि अब मैं अलग हूं।

👉🏻यदि तुम क्षण में जीने लगो तो तुम पाओगे कि तुम्हारा होना चमत्कार है, इसका अपना जादू है। प्रसन्नता गहन होगी।

👉🏻जीवन के प्रति मेरा दृष्टिकोण सकारात्मक है। तुम नृत्य करो, गाओ, प्रेम करो, तुम ध्यान करो। किसी भी तरह से तुम अपनी सजीवता की अनुभूति करने का प्रयत्न करो। तुम जो कुछ भी कर रहे हो उसे गहनता और इतनी पूर्णता से करो कि तुम्हारा पूरा जीवन सक्रिय हो उठे तुम्हारा रोम-रोम स्पंदित होता रहे।

👉🏻जीवन तो यही है। इसी जीवन को कुछ लोग नरक में बदल लेते हैं - अगर उनका जीवन को देखने का ढंग नकारात्मक हो। कुछ लोग स्वर्ग में बदल लेते हैं - अगर उनके जीवन को देखने का ढंग विधायक हो। कुछ लोग गुलाब की झाड़ी में कांटे भी गिनते रहते हैं और जिंदगी बीत जाती है और कुछ लोग फूल चुन लेत है। कांटे मत गिनो, फूल चुनो। – ओशो

👉🏻रामकृष्ण के पास मरदाना जैसा कोई कुशल कलाकार नहीं था, क्योंकि वह वही धुन बजाता था, जो वापस लौटा ले। धीरे-धीरे नानक वापस आ जाते, स्वस्थ हो जाने, शरीर में से जाते। मरदाना को उन्होंने जीवनभर साथ रखा। मरदाना मुसलमान था, नानक हिन्दू थे। मंदिर में भी जाते तो तभी जाते जब मरदाना साथ जा सके, क्योंकि मंदिर में तारी लग जाए। अगर कोई मंदिर कहता कि मुसलमान को न जाने देंगे तो वह मंदिर नानक के लिए बंद था।

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मेळघाटावरील मोहोर - मृणालिनी चितळे (230126) गांधी,विनोबा, गाडगे बाबा याचां डॉ रवी कोल्हेंवर वर प्रभाव आहे. खेड्याकडे चला हा गांधीजींचा संदेश होता. त्यातच डेव्हिड व्हर्नर या स्पॅनिश डॉक्टर ने लिहिलेल where there is no doctor ,रस्किन बॉण्ड लिखित Unto this last ही पुस्तके त्यांच्या वाचनात आली. दुर्गम खेड्यात जाऊन वैद्यकीय सेवा देण्याचं बीज त्यांच्या मनात रुजल.   एमबीबीएस शिक्षण पूर्ण झाल्यानंतर सुखासीन आयुष्य जगण्याची संधी असताना त्यांनी मेळघाटातील बैरागड या दुर्गम गावी स्थायिक होण्याचा निर्णय घेतला. 9 फेब्रुवारी 1985 बैरागडला जाणाऱ्या एसटीत ते बसले.दोन वर्षे तिथले अनुभव घेऊन एम डी शिक्षण आवश्यक आहे याची जाणीव त्यांना झाली. एम डी शिक्षण पूर्ण करून ते सपत्नीक बैरागड ला येऊन वैद्यकीय सेवा देऊ लागतात(1989). येणाऱ्या रुग्णांकडून सेवा शुल्क म्हणून केवळ एक रुपया घ्यायचा हा त्यांचा नियम होता. यातून महिना काठी ते केवळ चारशे रुपये कमवायचे. अत्यंत साधी राहणी ठेऊन त्यानीं संसार केला. वैद्यकीय सेवा देतानाच शेतीत प्रयोग करून पहायचे त्यांनी ठरवलं. यासाठी भाडे पट्ट्...

शेतकऱ्यांना मिळालेल बक्षीस...

शेतकऱ्यांना मिळालेल बक्षीस... (120126) माझे आजोबा शेतकरी होते. शेतीला जोड म्हणून ते किराणा मालाचे दुकानही चालवायचे. शेतात पेरणी करताना, खुरपताना,पाणी धरताना,भुईमूग काढताना मी त्यांना पाहिलय. दुग्ध व्यवसाय, किराणा दुकान, शेती यामुळे त्यांची आर्थिक ओढाताण कधी झाली नसावी. माझा आज्जा आणि त्याआधीच्या पिढ्या शेतकरी असल्याने शेतकऱ्यांच दुःख अस्वस्थ करतं. "खाऊजा" धोरणानंतर शेती शेतकऱ्यांचे प्रश्न अधिक गंभीर झाले. याविषयीचा जसजसा विचार करू तशी निराशा दाटून येते. शेतीचे प्रश्न - 👉🏻 जलसिंचनाच्या सुविधा नाहीत. 👉🏻 नियमित वीज पुरवठा नाही. रात्री अपरात्री वीज येते, तेव्हा पाणी धरायला जावं लागतं. 👉🏻 रानटी जनावर, पाखरं पिकांचे नुकसान करतात. आताशा बिबट्याची असणारी दहशत वेगळीच.. 👉🏻 केंद्र सरकारच आयात निर्यातीचं कोणतेही ठोस धोरण नसतं. 👉🏻 शेतकऱ्यांच्या हितापेक्षा ग्राहकांच्या हिताला सरकारकडून अधिक प्राधान्य दिलं जातं. 👉🏻 पिकाला हमीभाव कमी देणं. त्यानंतरही हमीभावानुसार खरेदी होईलच याची शाश्वती नसणं. त्यामुळे जीव टांगणीला लागून राहणं. 👉🏻 उत्पन्नाची शाश्वती नसल्याने सतत आर...

धर्म - चमत्कार आणि तत्वज्ञान

धर्म- चमत्कार आणि विज्ञान धर्माचे सेवक,गुरु धर्मप्रसार करतात. म्हणजे नेमकं काय करतात? एखाद्याने धर्मांतर केलं म्हणजे नेमकं काय केलं? चमत्कार आणि तत्त्वज्ञान या दोन बाबी धर्मप्रसारात येतात. आमचा देव त्याला शरण येणाऱ्यांच्या शारीरिक व्याधी, आर्थिक अडचणी चुटकीसरशी सोडवू शकतो, सोडवतो. हा भ्रम निर्माण केला जातो. काही धर्मप्रसारक नोकरीचे आमिष, आर्थिक प्रलोभन देतात. धर्म प्रसार करताना वा धर्माचे श्रेष्ठत्व सांगताना तत्त्वज्ञानाचा आधार घेणारं फारसं कोणी दिसत नाही. प्रलोभन दाखवून होणारे धर्मांतर खोगीर भरती आहे. याने संख्याबळ वाढतं आणि त्याचा राजकीय फायदा घेता येतो. गर्व से कहो हम हिंदू है  अल्ला हो अकबर.... यासारख्या घोषणा देऊन सुमारांची माथी भडकावलेली आहेत. परिस्थितीने पिचलेल्या सुमारांना धर्म नावाच्या कळपात सुरक्षित वाटतं आणि आर्थिक सुस्थितीत असलेल्यांना अभिमान वाटतो. धर्माचा धंदा करणाऱ्यांनी हे ओळखलय. या दोन्ही वर्गाच्या भावना चेतवून स्वहित साधण्याचं काम धर्माच्या ठेकेदारांनी आजपर्यंत केलं आहे, करत आहेत. धर्म ठेकेदारांच्या भूलथापांना बळी न पडता, लिखित धर्मग्रंथांना अंतिम न मानता, स्वबुद्...